समय की फैंटम थ्योरी, क्या इतिहास के 300 साल कभी घटे ही नहीं?
फैंटम टाइम हाइपोथेसिस (Phantom Time Theory) एक वायरल दावा है जिसमें कहा जाता है कि इतिहास के करीब 300 साल कभी घटित ही नहीं हुए। uplive24.com पर जानिए यह थ्योरी क्यों बनी, लोग इसे क्यों मान लेते हैं और इतिहासकार इसे पूरी तरह गलत क्यों बताते हैं।
Phantom Time Theory : सोचिए, अगर कोई आपसे कहे कि हम आज 2025 में नहीं, बल्कि 1726 में जी रहे हैं, तो? पहली नजर में यह किसी मीम या व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी का फॉरवर्ड लगता है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस दावे के पीछे एक असली इतिहासकार है, और उसका अपना साइंस फिक्शन जैसा सिद्धांत।
इस थ्योरी का नाम है फैंटम टाइम हाइपोथेसिस (Phantom Time Theory)। और इसके अनुसार, मध्यकाल के करीब 300 साल - 614 से 911 ईस्वी कभी अस्तित्व में थे ही नहीं। मतलब, वे साल इतिहास की किताबों में ऐसे घुस गए जैसे किसी ने कैलेंडर पर अतिरिक्त पन्ने चिपका दिए हों।
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यह अजीब-सी थ्योरी आखिर आई कहां से?
1991 में जर्मन इतिहासकार हेरिबर्ट इलीग ने दावा किया कि लगभग 297 साल को कृत्रिम रूप से जोड़ दिया गया था (Phantom Time Theory)। उनके अनुसार, यह टाइम मैनिपुलेशन किसी फिल्मी खलनायक ने नहीं, बल्कि तीन बेहद ताकतवर शासकों ने किया था - होली रोमन सम्राट ओट्टो तृतीय, पोप सिल्वेस्टर द्वितीय और संभवतः बीजान्टिन सम्राट कॉन्सटैनटाइन सप्तम।
इलीग का कहना था कि ये शासक वर्ष 1000 तक जल्दी पहुंचना चाहते थे, जो धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता था। इसलिए उन्होंने कैलेंडर को आगे बढ़ा दिया और इतिहास में काल्पनिक घटनाएं, नकली कागजात और मनगढ़ंत राजाओं के नाम जोड़ दिए (Phantom Time Theory)।
अगर यह सही होता, तो इसका मतलब है कि वाइकिंग्स के इंग्लैंड पर हमले कभी नहीं हुए, अल्फ्रेड द ग्रेट नाम का कोई राजा नहीं था, चार्लमैन एक काल्पनिक चरित्र था और चीन का तांग वंश गलत तारीखों में दर्ज किया गया।
यह सब सुनने में रोमांचक लगता है - जैसे किसी रहस्य उपन्यास की कहानी जहां शासक मिलकर समय को ही बदल देते हैं।
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लोगों को यह सिद्धांत (Phantom Time Theory) आकर्षक क्यों लगता है?
इसका कारण यह है कि शुरुआती मध्यकाल में लिखित दस्तावेज कम मिलते हैं। उस दौर में पढ़ने-लिखने वाले लोग भी कम थे। इसलिए कुछ हिस्से वाकई अधूरे लगते हैं। साथ ही, कैलेंडर का नियंत्रण चर्च के पास था, जिससे संदेह करने वालों को लगता है कि छेड़छाड़ मुमकिन थी (Phantom Time Theory)।
लेकिन कहानी यहीं तक चलती है। इसके आगे यह सिद्धांत पूरी तरह बिखर जाता है और इसकी वजह है :
दुनिया के अन्य हिस्सों का इतिहास इससे मेल नहीं खाता : अगर 300 साल जोड़े गए होते, तो इस्लामी जगत का स्वर्ण युग भी नकली होता और चीन के तांग वंश की कविताएं, आविष्कार और राजकीय दस्तावेज भी काल्पनिक होते। इसी तरह से भारत, अरब, चीन, यूरोप - सभी देशों के इतिहासकारों को एक ही गलती करनी पड़ती। इतना बड़ा वैश्विक झूठ असंभव है, खासकर तब जब उनके आपसी संपर्क भी सीमित थे।
जिन तीन शासकों को साजिश का मास्टरमाइंड बताया गया, वे एक समय में जीवित ही नहीं थे : पॉप, सम्राट और बीजान्टिन राजा - तीनों की जन्म और मृत्यु की तिथियां एक-दूसरे से मेल ही नहीं खातीं। यानी उनके साथ बैठकर साजिश रचने की बात इतिहास से ही खारिज हो जाती है (Phantom Time Theory)।
विज्ञान इस सिद्धांत को पूरी तरह गलत साबित करता है : प्रकृति अपना खुद का कैलेंडर रखती है और यह कैलकुलेटर से भी ज्यादा सटीक होता है। पेड़ों की वार्षिक वलय (dendrochronology) बिना किसी गैप के लगातार 2000+ साल का डेटा देती है। खगोलीय घटनाएं - जैसे ग्रहण, धूमकेतु आदि आज की गणनाओं से बिल्कुल मेल खाती हैं।
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अगर 297 साल जोड़े (Phantom Time Theory) गए होते, तो ये वैज्ञानिक रिकॉर्ड तुरंत विरोधाभास दिखाते। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं मिलता।
समर्थक कहते हैं कि 1582 में ग्रेगोरियन कैलेंडर लागू होने पर 13 दिन हटने चाहिए थे, जबकि हटे सिर्फ 10। इतिहासकार बताते हैं कि गणना 45 ईसा पूर्व से नहीं, बल्कि 325 ईस्वी (काउंसिल ऑफ नाइसिया) से की गई थी, इसलिए 10 दिन बिल्कुल सही थे।
तो क्या 300 साल वाकई नकली हैं (Phantom Time Theory)? इसका सीधा जवाब है, बिल्कुल नहीं। फैंटम टाइम हाइपोथेसिस एक शानदार कहानी है, और शायद इसी वजह से बार-बार वायरल हो जाती है।

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